आनलाइन हस्ताक्षर करके विरोध जतायें
विष्णु राजगढ़िया
बिहार में सूचना मांगने वालों को प्रताड़ित करने की काफी शिकायतें आ रही हैं। अब बिहार सरकार ने सूचना पाने के नियमों में अवैध संशोधन करके एक आवेदन पर महज एक सूचना देने का नियम बनाया है। अब गरीबी रेखा के नीचे के लोगों को सिर्फ दस पेज की सूचना निशुल्क मिलेगी, इससे अधिक पेज के लिए राशि जमा करनी होगी। ऐसे नियम पूरे देश के किसी राज्य में नहीं हैं। ऐसे नियम सूचना कानून विरोधी हैं। इससे सूचना मांगने वाले नागरिक हताश होंगे। इससे नौकरशाही की मनमानी बढ़ेगी। इस तरह बिहार सरकार ने सूचना कानून के खिलाफ गहरी साजिश की है। अगर सूचना पाने के नियमों में संशोधन हुआ तो नागरिकों को सूचना पाने के इस महत्वपूर्ण अधिकार से वंचित होना पड़ेगा। एक समय बिहार को आंदोलन का प्रतीक माना जाता था। आज सूचना कानून के मामले में बिहार पूरे देश में सबसे लाचार और बेबस राज्य नजर आ रहा है। वहां सुशासन की बात करने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दुशासन की भूमिका निभाते हुए कुशासन को बढ़ाना देने के लिए सूचना कानून को कमजोर किया है।
इसलिए आनलाइन पिटिशन पर हस्ताक्षर करके अपना विरोध अवश्य दर्ज करायें। इसके लिए यहां क्लिक करें-
http://www.petitiononline.com/rtibihar/petition.html
संशोधन के संबंध में विस्तृत जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें
http://mohallalive.com/2009/11/19/nitish-government-changed-right-to-information-act/
ARTICLE of Sri Manikant Thakur in BBC Hindi सूचना के अधिकार पर अत्याचार?
http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2009/11/091121_bihar_rti_pp.shtml?s
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Friday, November 20, 2009
Monday, September 7, 2009
स्मिता और डिसूजा के सच की दुनियाविष्णु राजगढ़िया
कोई खुद अपना सच सार्वजनिक करना चाहता है। इसमें दूसरों को कोई आपत्ति नहीं। फिलहाल तो अपन ऑल्विन डिसूजा और स्मिता मथाई के लिए चिंतित हैं कि सच का सामना के बाद उनकी दुनिया क्या होगी।
पहले एपिसोड में स्मिता मथाई ने सच का सामना किया। यह मध्यवर्गीय शिक्षिका को अपना घर चलाने के लिए डिब्बाबंद भोजन की भी आपूर्ति करनी पड़ती है। पति शराबी जो ठहरा। एपिसोड में पति महोदय के सामने स्मिता मथाई मानती है कि सिर्फ बच्चों के कारण वह पति के साथ है। यहां तक कि वह अपने पति की हत्या करने और उसे धोखा देने तक की सोचती है।
अगला सवाल था- अगर आपके पति को पता नहीं चले तो क्या आप किसी गैर-मर्द के साथ हमबिस्तर होंगी? स्मिता मथाई का जवाब था- नहीं। लेकिन पोलिग्राफ मशीन कहती है कि स्मिता मथाई झूठ बोल रही है। इस वक्त तक पांच लाख रुपये कमा चुकी स्मिता मथाई को खाली हाथ लौटना पड़ा।
पांचवें एपिसोड में ऑल्विन डिसूजा ने अपने सारे पाप कबूल लिये। अपनी मां, बहन, सास और पत्नी के सामने। चोरी-छिपे लेडिज टॉयलेट में घुसने और काम के बहाने दोस्तों के साथ मौज-मस्ती करने की बात उसने गर्व के साथ स्वीकारी। उसने माना कि अगर बीबी को पता नहीं चले तो वह किसी अन्य लड़की के साथ शारीरिक संबंध बना सकता है, लेकिन अगर बीबी धोखा देगी तो बर्दाश्त नहीं। वह पत्नी के साथ अंतरंग पलों में दूसरी के सपने भी देखता है। वह जोरू का गुलाम है। वह सोचता है कि उसकी बीबी कोई और होती।
सामने बैठी पत्नी उर्वशी ने हर सच के 'सच होने पर खुशी से तालियां बजायीं। ऑल्विन डिसूजा ने सारा सच मुसकुराते हुए स्वीकारा। लेकिन उसने यह नहीं माना कि क्रूज शिप में नौकरी के दौरान यात्री के सामान चुराये। पोलिग्राफ मशीन ने इसे डिसूजा का झूठ माना। उस वक्त तक जीते हुए दस लाख गंवाकर वह खाली हाथ लौटा।
स्मिता ने पति और ऑल्विन ने पत्नी के सामने ऐसी बातें मानीं जो शेष जीवन में जहर घोल सकती हैं। लेकिन प्रतियोगी और परिजन, सब सहज प्रसन्न्ता के साथ तालियां बजा रहे थे। दरअसल उन्हें एक करोड़ रुपये दिख रहे थे। सच कबूलने के इतने पैसे मिलें तो सब पाप माफ। लेकिन खाली हाथ लौटे प्रतियोगी के पाप को कौन अपनायेगा? स्मिता ने तो मान लिया कि वह ग्राहकों को बासी खाना परोसती है। कौन लेगा उससे टिफिन? कार्यस्थल पर यात्री का सामान चुराने वाले के लिए भला किस कंपनी में जगह? चोरी का कोई पुराना केस भी खुल जाये तो क्या कहना!
Thursday, July 30, 2009
Wednesday, July 29, 2009
रघुवीर सहाय एवं महेश्वर को समर्पित यह ब्लाग
....................................................................................................................................................हम सच बोलते हैं तो हमें लगता है कि हमारी शक्ति का असर होना चाहिए.
लेकिन जब हम अधूरे सच या झूठ बोलनेवालों की शक्ति का असर ज्यादा होता हुआ पाते हैं तो माथा ठनकता है कि ऐसा क्यों हो रहा है.
पता चलता है कि सच बोलने से ही काम नहीं चलेगा.
अगर हम चाहते हैं कि सच को ज्यादा लोग सच समझें भी और सच को समझकर उसके अनुसार आचरण भी करें, तो सच के व्यापक प्रचार के साधनों का इस्तेमाल भी करना पड़ेगा.......
(लेकिन) पता चलता है कि प्रचार के साधन उनके पास ज्यादा हैं, जिन्हें आधे सच का प्रचार करना है....
--रघुवीर सहाय
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’’सत्य को जानो, वह तुम्हें मुक्त करेगा’’ - इस पुरानी अमरीकी कहावत को दुहराते हुए हमारा प्रेस कहता है कि वह सच्चाई और सिर्फ सच्चाई से प्रतिबद्ध है.
......वह सत्य क्या है? इस सत्य का कोई मकसद- उसकी कोई दिशा होती है या नहीं? उसका समाज के विकास में और इस विकास के रथ को आगे बढ़ानेवाली सामाजिक शक्तियों के उत्थान में कोई योगदान है या नहीं?
सत्य के दायरे में सामाजिक आलोचना की कोई जगह है या नहीं?
और अगर इसके लिए जगह है तो आदमी को विचारवान बनाने में उसकी कोई भूमिका होगी या नहीं???
और अगर इसके लिए जगह है तो आदमी को विचारवान बनाने में उसकी कोई भूमिका होगी या नहीं???
--महेश्वर
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