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Saturday, July 9, 2011

आज अख़बारों को संपादक नहीं, मैनेज़र चाहिए : हरिवंश


हरिवंश जी देश के मूल्‍यवान पत्रकार हैं। बड़े महानगरों में चमक से भरी पत्रकारिता का लोभ छोड़ कर आज से दो दशक पहले वे रांची जैसे बियाबान में गये, एक मरते हुए अख़बार को ज़ि‍न्‍दगी देने। आज रांची राजधानी है, और हरिवंश जी का अख़बार प्रभात ख़बर पूरे प्रांत का नंबर वन अख़बार है। इन दो दशकों में पत्रकारिता पर बाज़ार हावी हुआ, लेकिन अपने अख़बार के लिए बहुत सारे समझौतों के बावजूद हरिवंश जी ने प्रभात ख़बर की गरिमा कम नहीं होने दी। रायपुर से छपने वाली पत्रिका मीडिया विमर्श के लिए प्रभात ख़बर के ही एक स्‍थानीय संपादक विष्‍णु राजगढ़ि‍या ने अपने प्रधान संपादक हरिवंश से पत्रकारिता के इस दौर में संपादक के बदलते अभिप्राय पर बात की। उसका एक ज़रूरी अंश हरिवंश जी की अनुमति से हम मोहल्‍ले में बांच रहे हैं।
इस अंश में हरिवंश जी ने बताया है कि क्‍या संपादक की भूमिका और उसका काम आज भी वही है या समय के साथ इसमें कोई बदलाव आया है। अगर बदलाव आया हो, तो किस-किस दौर में, किस-किस तरह के बदलाव आये और उनकी क्‍या वजह रही।


एक धारा है, जो आज संपादक को ग़ैरज़रूरी मानती है। उसका मानना है कि संपादक के बगैर अख़बार बेहतर तरीके से चल, निकल और बढ़ सकते हैं। भारत के अख़बारों के लिए प्रयोगों का नेतृत्‍व ‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ करता है। इस अख़बार में पहले श्‍यामलाल या गिरिलाल जैन जैसे लोग थे या दूसरे अख़बारों में एस मूलगांवकर, अजीत भट्टाचार्जी, वीजी वर्गीज, अरुण शौरी, कुलदीप नैयर, एनजे नानपुरिया, प्रेम भाटिया, प्राण चोपड़ा, दुर्गा दास, चलपति राव, फेंक मोरेस जैसे लोग रहे हैं। और पीछे लौटें तो एक से एक दृष्टिसंपन्‍न संपादक हुए। आज़ादी के बाद हिंदी में अज्ञेय, रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती, मनोहर श्‍याम जोशी, अक्षय जैन, राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी जैसे लोग हुए। मराठी में गोवंद तलवलकर या गुजराती में हरेंद्र दवे या बांग्‍ला में गौरकिशोर घोष या अन्‍य राज्‍यों में या क्षेत्रीय भाषाओं में भी अनेक ऐसे जाने-माने संपादक रहे, जिन्‍हें आज समाज श्रद्धा और विनय से याद करता है। उनकी भूमिका ने समाज में प्रगतिशील चेतना पैदा करने में मदद की। मूलत: इन दिग्‍गज पत्रकारों-संपादकों ने अपनी निजी गरिमा रखते हुए बेखौफ सवाल उठाये। जहां अन्‍याय होता दिखा, उसके प्रतिकार में खड़े रहे। चूंकि ऐसे लोगों का निजी जीवन इतना साफ-सुथरा, पारदर्शी और ईमानदार था कि वे पूरी व्‍यवस्‍था के लिए चुनौती बन जाते थे। उनकी बातें गौर से सुनी जाती थीं।

आज संपादक पद का क्षय खुद संपादकों की वजह से ज्‍यादा हुआ है। प्रबंधन तो बाद में आता है। आमतौर से यह धारणा थी कि भारतीय प्रेस ‘जूट प्रेस’ है। देश के आज़ाद होते ही यह मामला स्‍वर्गीय फिरोज गांधी ने संसद में उठाया था कि भारतीय प्रेस बड़े औद्योगिक घरानों के कब्‍जे में है। फिर भी जिसे ‘जूट प्रेस’ कहा गया, उसी ‘जूट प्रेस’ पर भारतीय मानस सबसे अधिक यकीन करता था। वीजी वर्गीज ने सिक्किम के विलय के ख़ि‍लाफ़ लिखा या इंदिरा-राजीव गांधी के जमाने में प्रेस ने भ्रष्‍टाचार के अनेक प्रकरण उजागर किये। धीरे-धीरे प्रेस ने अपने काम से एक विश्‍वास अर्जित किया कि प्रेस बेख़ौफ़ होकर गंभीर मुद्दों को उठाता है, ताक़तवर से ताक़तवर लोगों के ख़ि‍लाफ़ ख़बरें छापता है। प्रेस को निडर होने की नैतिक ताक़त समाज से मिली। आज भी आप प्रणय रॉय, राजदीप सरदेसाई, स्‍वर्गीय सुरेंद्र प्रताप सिंह, विनोद मेहता वगैरह को देखें तो प्रेस की भूमिका का एक एहसास होता है। परंतु बड़े पैमाने पर आज प्रेस की भूमिका संपादकों की वजह से बदल गयी है। हालांकि इसमें अपवाद भी काफी मिलेंगे। अनेक योग्‍य ईमानदार और साहस के साथ काम करने वाले संपादक हिंदी से लेकर अन्‍य भाषओं में हैं। लेकिन हिंदी जगत में, हिंदी अख़बारों की दुनिया में एक बड़ा परिवर्तन आया है। अब संपादक बनने के लिए योग्‍यता, बौद्धिक क्षमता या उसका ईमानदार होना ग़ैरज़रूरी चीज़ बन गये हैं। संपादक के चयन की मुख्‍यधारा है कि आप कैसे अख़बार के प्रबंधन के लिए चीज़ों को मैनेज कर सकते हैं। आप किस राजनीतिक दखल या मदद से अख़बार के प्रतिष्‍ठानों में कुर्सी पा सकते हैं। लाइजनिंग के काम में आप कितने माहिर हैं। प्रोफेशनल एक्‍सपर्टाइज़ अब संपादक बनने के लिए ज़रूरी नहीं है। अख़बार में काम करने वाले बड़े पदों पर बैठे लोग अब खुद उद्योगपति बनना चाहते हैं और वे संपादक के रूप में अख़बार का इस्‍तेमाल इसी उद्देश्‍य से करते हैं। इसके अनेक उदाहरण मिल जाएंगे। यह बड़े समूहों में हो रहा है।

दूसरी ओर आज संपादकों की कोई सोशल एकाउंटिबिलिटी नहीं रह गयी है। ख़बरों का चयन संपादक अपने उद्योगपति बनने की दृष्टि से ही करते हैं। मसलन, जिस राज्‍य से अख़बार निकल रहे हों, वहां के मुख्‍यमंत्री को किसी महत्‍वपूर्ण सर्वेक्षण में सबसे नाकाबिल माना जाता है, लेकिन उसकी ख़बर जो अख़बार इस सर्वेक्षण के काम में लगा है, वही नहीं छापेगा। 1991 के बाद भारत में उदारीकरण के दौर ने अनेक संस्‍थाओं को गहराई से प्रभावित किया। अख़बार जगत भी इससे अप्रभावित नहीं है। बाज़ार बनती दुनिया में माना जाने लगा है कि संपादक का काम मैनेज़र भी कर सकता है। अनेक बड़े अख़बार समूहों में संपादक की छुट्टी भी कर दी गयी और ब्रांड मैनेज़र उनका काम संभालने लगे।

परंतु इन तीन-चार वर्षों में इन बड़े अख़बारों में भी एक बड़ा परिवर्तन आया है। मसलन, ‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ ने अपने कुछ संस्‍करणों में संपादकीय पेज ग़ैरज़रूरी मान कर ख़त्‍म कर दिया था। पुन: उसे शुरू करना पड़ा है। किताबों पर एक पन्‍ना, गंभीर विषयों पर बहस, पुराने दार्शनिकों पर सामग्री प्रकाशन जैसी चीजें अब ‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ में दिखाई देने लगी हैं। स्‍पष्‍ट रूप से जो अख़बार ‘पेज़ थ्री’ की संस्‍कृति का प्रतिनिधित्‍व करने वाला कहा जाता था, अब वह अंग्रेज़ी का एक बेहतर, गंभीर और बड़े समुदाय में पढ़ा जाने वाला अख़बार है। यह परिवर्तन उल्‍लेखनीय है। प्रतिस्‍पर्धा के इस दौर में समृद्ध कंटेंट ही अख़बारों का भविष्‍य तय करेंगे और यह कंटेंट तय करने का काम समाज को अधिक नज़दीक से समझने वाला संपादकीय समूह ही कर सकता है। उपभोक्‍ताओं से ताल्‍लुक रखने वाला बाज़ार या बाज़ार के विशेषज्ञ मैनेज़र नहीं कर सकते।

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